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फिल्म संगीत के सरताज थे लक्ष्मीकांत
26 मई 2020 10:30
पुण्यतिथि 25 मई पर भावभीनी श्रद्धांजलि
★"वो जब याद आए बहुत याद आए"
■ हेमन्त शुक्ल
हिंदी फिल्मों मैं मधुर गीत-संगीत के चहेतों को "हंसता हुआ नूरानी चेहरा" गीत जरूर याद होगा। विविध भारती के भूले बिसरे गीतों में कल यही गीत जब बजा तब इस फिल्म के संगीतकार जिन्हें पहली बार किसी फिल्म में स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का मौका मिला था "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल" के लक्ष्मीकांत की याद हो आयी। वर्ष 1998 के इसी महीने की 25 मई एक ऐसी मनहूस तिथि थी जिस दिन इस जोड़ी के लक्ष्मीकांत हमेशा के लिए अपने चाहने वालों को छोड़कर अनन्त रास्ते पर चले गए। फिल्म पारसमणि-1963 (महिपाल, गीतांजलि, जीवन काला, अरुणा ईरानी, हेलन, मनहर देसाई और मारुति) के सदाबहार गीत "हंसता हुआ नूरानी चेहरा" और "वो जब याद आए बहुत याद आए" जैसे फिल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। बाक्स आफिस पर फिल्म पारसमणि की सफलता के बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर का जन्म 3 नवंबर 1937 को लक्ष्मी पूजन के दिन हुआ था। इसी वजह से उनका नाम लक्ष्मी रखा गया। उन्होंने अपने बचपन के दिन मुम्बई के विले पार्ले (पूर्व) की मलिन बस्तियों में अत्यन्त गरीबी के बीच बिताया। उनके पिता जो कि एक सिनेमा में मैनेजर थे, की मृत्यु तब हो गयी जब वह बच्चे ही थे। अपने परिवार की खराब वित्तीय हालत के कारण वे अपने शैक्षणिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके। लक्ष्मीकांत के पिता के दोस्त, जो खुद एक संगीतकार थे ने लक्ष्मीकांत व उनके बड़े भाई को संगीत सीखने की सलाह दी। इस सलाह के बाद लक्ष्मीकांत ने सारंगी और बड़े भाई ने तबला बजाना सीखा। लक्ष्मीकांत ने जाने-माने सारंगी वादक हुसैन अली की संगत में दो साल बिताए और सारंगी के तारों से मधुर से मधुर रागों पर रियाज किया।
बात 1977 के नवंबर माह की है जब मुम्बई में वैशाली फिल्म्स की फिल्म सारा जहां के गीत संगीत का जिम्मा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को निर्माता दीनानाथ शास्त्री (पिछली फिल्म "धरती कहे पुकार के") ने सौंपा था और गीतकार संतोष आनंद जी दिल्ली से रिकॉर्डिंग के लिए अपना गीत लेकर मुम्बई आए थे। सांताक्रुज ईस्ट की छठी गली स्थित बापूजी निवास, जहां किसी जमाने में शैलेन्द्र रहा करते थे और फणीश्वर नाथ रेणु तक वहां आ कर लिखते थे। उस समय इसी फ्लैट में बायस्कोप फिल्म पत्रिका का ऑफिस था, जहां संतोष आनन्द जी रोके गए थे। इस दौरान दो-तीन दिन लगातार रिहर्सल होता रहा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी की जोड़ी हारमोनियम के साथ वहां आ जाती थी जिसमें गीतकार संतोष आनन्द जी गीत "नदिया गहरी बालम, पकड़ लीजिए पकड़ लीजिए" के भाव को समझाते थे फिर बाद में लता जी और आशा जी के साथ उसका रिहर्सल होता। उसी दौरान हमारी पत्रिका बायस्कोप ने तय किया कि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के ऊपर एक अच्छा आर्टिकल बनाया जाए। इसके लिए बीच-बीच में उनसे मेरी और संपादक जी की बात हुआ करती। इन मुलाकातों से लक्ष्मीकांत के बारे में तमाम व्यक्तिगत बातें, घर की बातें, शुरुआती दौर की बातें पता चलीं जिन्हें आर्टिकल में समाहित करना था और आज मैं भी उन याददाश्त को इस आलेख में कहीं न कहीं जोड़ पा रहा हूं।

लक्ष्मीकांत ने अपने फिल्म करियर की शुरुआत एक बाल अभिनेता के रूप में हिंदी फिल्म भक्त पुंडलिक (1949) और आंखें (1950) फिल्म से की। उन्होंने कुछ गुजराती फिल्मों में काम किया, लेकिन संगीत की ललक ने अभिनय से दूर कर दिया। जब लक्ष्मीकांत दस साल के थे तब उन्होंने लता मंगेश्कर के कंसर्ट में, जो रेडियो क्लब कोलाबा हुआ था, में सारंगी बजाने का काम किया। लता जी उनसे इतना प्रभावित हुईं कि संगीत कार्यक्रम के बाद उन्होंने लक्ष्मीकांत से बात करते हुए उनकी मदद का वादा किया। इस बीच घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए लक्ष्मीकांत ने संगीत समारोह में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने वाद्ययंत्र मेंडोलिन में बजाने की शिक्षा बालमुकुंद इन्दौरकर से ग्रहण की। इसके साथ ही मशहूर संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम से उन्होंने वायलिन बजाना भी सीख लिया। इसी कार्यक्रम में प्यारेलाल शर्मा भी हिस्सा ले रहे थे, जो वायलिन बजाते थे। इस दौरान अपने वादे के अनुसार लताजी ने संगीतकार शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन और सी. रामचंद्र को सहायक के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के नाम सुझाए, लेकिन इन्होंने अपने करियर की शुरुआत संगीतकार कल्याणजी आनंदजी के सहायक के तौर पर शुरू की। सहायक निर्देशक के तौर पर इन्होंने "मदारी, सट्टा बाजार, छलिया" और "दिल भी तेरा हम भी तेरे" जैसी कई फिल्मों में काम किया। अब तक दोनों की जोड़ी यानी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी बन चुकी थी।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जोड़ी के सिने करियर की अहम फिल्मों में से एक है वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म "अमर अकबर एंथोनी"। यूं तो इस फिल्म के सभी गाने सुपर हिट हुए लेकिन यह गीत "हमको तुमसे हो गया है प्यार" गीत फिल्मी संगीत जगत की अमूल्य धरोहर के रूप में आज भी याद किया जाता है। इस गीत में पहली बार और अंतिम बार लता मंगेश्कर, मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार जैसे नामचीन पार्श्वगायकों ने अपनी आवाज दी थी। इसके साथ ही "माय नेम इज एंथोनी गोंजाल्विस" गीत के जरिए प्यारेलाल ने अपने संगीत शिक्षक एंथोनी गोंजाल्विस को भी श्रद्धांजलि दी थी। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के पसंदीदा पार्श्वगायक के रूप में मोहम्मद रफी का नाम सबसे पहले आता है। वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म पारसमणि की कामयाबी के पश्चात रफी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने अपने गीत-संगीत से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और पार्श्वगायक रफी के न भूलने वाले गानों की लंबी सूची में शामिल कुछ अच्छे गीत जैसे-- "चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे (दोस्ती 1964), "पत्थर के सनम तुझे हमने मोहब्बत का खुदा माना" (पत्थर के सनम 1967), "यह दिल तुम बिन लगता नहीं हम क्या करें" (इज्जत 1968), "आने से उसके आए बहार जाने से उसके जाए बहार व एक बंजारा गाए जीवन के गीत सुनाए व आ मेरे हमजोली आ खेले आंख मिचोली" ( जीने की राह 1969), "झिलमिल सितारों का आंगन होगा" (जीवन मृत्यु 1970) जैसे कर्णप्रिय गीत दिए। इसके अलावा 1970 की ही फिल्म बचपन में "आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने लेकर आया रे" तथा इसी साल की फिल्म दास्तान में "ना तू जमीं के लिए ना आसमां के लिए", 1972 की फिल्म लोफर में "आज मौसम बड़ा बेईमान है", 1973 की फिल्म अपनापन का गीत "आदमी मुसाफिर है आता है जाता है", 1977 की फिल्म अमर अकबर एंथोनी में "पर्दा है पर्दा पर्दे के पीछे पर्दानशी है व हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें", 1977 की ही फिल्म दोस्ताना का गीत "बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा व मेरे दोस्त यह किस्सा यह क्या हो गया", 1980 की फिल्म नसीब में "जॉन जॉनी जनार्दन, चल चल चल मेरे भाई" जैसे मधुर और न भूलने वाले गीत शामिल हैं।

जहां तक इस जोड़ी के प्रिय गीतकारों में आनन्द बक्षी का नाम सबसे ऊपर था और इनके लिखे गीतों को जो धुनें उन्होंने दी वह सभी अमर हो गयीं। इन तीनों की जोड़ी वाली सुपरहिट फिल्मों के गीतों में कुछ और जैसे-- सावन का महीना पवन करे शोर, राम करे ऐसा हो जाए (मिलन 1967), बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेगी, खिजा के फूल पे आती कभी बहार नहीं (दो रास्ते 1969), जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं (महबूब की मेहंदी 1971), हम तुम एक कमरे में बंद हो (बॉबी 1973), माय नेम इज एंथोनी गोंजाल्विस (अमर अकबर एंथोनी 1977), सत्यम शिवम सुंदरम (सत्यम शिवम सुंदरम 1978), डफली वाले डफली बजा (सरगम 1979), दर्दे दिल दर्दे जिगर (कर्ज 1980), बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा (दोस्ताना 1980), चल चल चल मेरे भाई (नसीब 1981), हम बने तुम बने एक दूजे के लिए (एक दूजे के लिए 1981), प्यार करने वाले कभी डरते नहीं (हीरो 1983), मैं तेरा दुश्मन दुश्मन तू मेरा (नगीना 1986), तू मेरा कर्मा तू मेरा (धर्मा 1986), चिट्ठी आयी है वतन से चिट्ठी आयी है (नाम 1986), माय नेम इज लखन (राम लखन 1989), जुम्मा चुम्मा दे दे (हम 1991), तू मुझे कबूल मैं तुझे कुबूल (खुदा गवाह 1992) और चोली के पीछे क्या है (खलनायक 1993) प्रमुख हैं। अमूमन फिल्मी दुनिया में ऐसा नहीं दिखता लेकिन लक्ष्मीकांत और आरडी बर्मन यानी पंचम दा की दोस्ती जग मशहूर थी। दोनों एक-दूसरे के समकालीन तो थे ही आपस में दूसरे की सहायता भी खूब किया करते थे। आरडी बर्मन के शुरुआती दौर की फिल्म छोटे नवाब और भूत बंगला के संगीत रचने में लक्ष्मीकांत ने उनकी काफी मदद की थी तो लक्ष्मीकांत के शुरुआती दौर की फिल्म दोस्ती में आरडी बर्मन ने बड़े प्यार से माउथ ऑर्गन बजाया था जिसे काफी सराहना भी मिली थी। यही नहीं हेमंत कुमार के संगीत-निर्देशन में बनी 'नागिन' के गीत 'जादूगर सैयां छोड़ो मोरी बैयां' एवं सचिन देव बर्मन की 'लाजवंती' के 'कोई आया धड़कन कहती है' में लक्ष्मीकान्त ने मैन्डोलिन बजाया था।

बात सन् 57-58 की है जब लक्ष्मीकांत इंडस्ट्री के लगभग सभी गुणवान संगीतकारों की शागिर्दगी कर उन लोगों से संगीत के गुर सीख रहे थे तभी उन्हें सचिन देव बर्मन साहब के असिस्टेंट के तौर पर भी एक फिल्म नॉटी ब्वॉय मिली थी और उसी दौरान राहुल देव बर्मन से इनकी पहली मुलाकात हुई। उन्हें हमेशा अच्छी तरह याद रहा जब इनको शुरुआती दौर में पारसमणि, हरिश्चंद्र तारामती और दोस्ती जैसी फिल्में मिलीं तब पंचम दा ने उनसे कहा था- "यह तुम लोगों ने कैसी धार्मिक संत महंथ टाइप की तथा बच्चों वाली फिल्में स्वीकार कर ली है। अगर शुरू में एक बार ऐसी फिल्मों के चक्कर में उलझ गए तो समझो हो गया बंटाधार, जबकि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल इस फिराक में थे कि फिल्म जैसी भी हो उसे स्वीकार कर उसमें उत्कृष्ट संगीत देने की कोशिश करेंगे और इन लोगों ने उस दौर की सभी फिल्मों में एक से एक संगीत रचना की। लक्ष्मीकांत जी ने किसी साक्षात्कार में बताया था कि मुझे यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं की पंचम दा की एक धुन "कुछ ना कहो कुछ भी ना कहो" गीत की धुन पर मैंने हीरो में "डिंग डोंग ओ बेबी सिंग सॉन्ग" को थोड़ा-थोड़ा फिट किया था और इसीलिए मैं यह भी कह सकता हूं की पंचम दा कभी-कभी हमारे लिए प्रेरणादायक संगीतकार भी थे।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने 4 दशक से अधिक लम्बे सिने करियर में लगभग 500 फिल्मों को संगीतबद्ध किया। वर्ष 1990 में प्रदर्शित फिल्म क्रोध में अपने संगीतबद्ध गीत "ना फनकार तुझसा तेरे बाद आया, मोहम्मद रफी तू बड़ा याद आया" के जरिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मोहम्मद रफी को अपनी श्रद्धांजलि दी है।
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को 7 बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी जोड़ी को सबसे पहले वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म दोस्ती के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1967 में फिल्म मिलन, वर्ष 1969 में फिल्म जीने की राह, वर्ष 1977 में अमर अकबर एंथोनी, वर्ष 1978 में फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम, वर्ष 1979 में फिल्म सरगम और वर्ष 1980 में फिल्म कर्ज के लिए भी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के पुरस्कार से सम्मानित किये गए।

अपने मधुर संगीत से श्रोताओं को भावविभोर करने वाली इस जोड़ी के महान संगीतकार लक्ष्मीकांत 25 मई 1998 को इस दुनिया को अलविदा कह कर हमसे दूर चले गए। आज जब लक्ष्मीकांत याद आ रहे हैं तो मन का एक कोना उनको याद करके आवाज दे रहा है और दूसरी ओर तुरंत आंखों में आंसू भी उमड़ आते हैं यह सोच कर कि लक्ष्मीकांत जी सचमुच ही फिल्म संगीत के सरताज थे।
 
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