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किसानों की गुलामी और बर्बादी का परवाना हैं किसान बिल
25 सितम्बर 2020 18:33



(डॉ संजय लाठर)

नरेंद्र मोदी ने सत्ता में
आने के लिए देश के किसानों से एक वादा किया था। ये वादा 2020 तक किसानों की आमदनी दोगुनी
करने का था। किसानों को लॉलीपॉप देकर मोदी सरकार सत्ता में तो काबिज हो गई। लेकिन किसानों
की आमदनी दोगुना करना तो बहुत दूर की कौड़ी है। उल्टे इस सरकार की किसान नीति ऐसी है
कि किसानों की आमदनी बढ़ने की बजाय घट गई। किसानों के हितों को लगातार नुकसान पहुंचा
रही इस सरकार को सिर्फ इतने से संतोष नहीं हुआ। अब चार कदम आगे चलकर संसद में किसान
विरोधी बिल पारित कराकर किसानों की बर्बादी का मुकम्मल इंतजाम कर दिया है। संसद में
पारित इन विधेयकों के कानून बनने के साथ ही बेबस किसानों का उद्योगपतियों का गुलाम
या नौकर बनकर रह जाना तय हो जाएगा।


इस कानून के प्रावधान ऐसे
हैं कि किसानों को वाजिब दाम तो मिलने से रहा। इसके साथ ही मध्यम वर्ग और गरीबों पर
भी मार पड़ेगी। एक तरफ किसान कंगाल होगा। दूसरी तरफ उद्योगपतियों के एकाधिकार की वजह
से कृषि उपज की कीमतों में उछाल मध्यम वर्ग और गरीबों के घर के बजट को उलट पुलट कर
देगा। इस कानून के प्रावधानों से कालाबाजारी बढ़ेगी। रोजाना उपयोग की खाद्य वस्तुओं
जैसे अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज, आलू की कीमत दोगुनी चौगुनी बढ़ जाएगी। मध्यम
और गरीब वर्ग को सारी कमाई खाने में ही खर्च करने को मजबूर होना पड़ेगा।


कुछ किसान संगठन और सरकार
इस बात पर उलझे हैं कि एमएसपी यानी किसानों को उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा
या नहीं। तो ये जान लीजिए कि इन कानूनों से सिर्फ एमएसपी का नुकसान ही नहीं होगा। बल्कि
तीनों कानून उद्योगपतियों की हजारों लाखों करोड़ रुपए कमाई के लिए इतने शातिर तरीके
से बनाए गए हैं कि इसका असर किसानों के लिए बहुत ही भयावह होगा। इस सरकार ने खतरनाक
कानूनों का जाल बुना है। लेकिन सरकार ढिढोरा पीट-पीट कर कह रही है कि एमएसपी बंद नहीं
होगा तो आप ये जान लीजिए कि सरकार चाहकर भी तीन-चार साल एमएसपी बंद नहीं कर सकती है।
इसकी वजह ये है कि सेना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के लिए अनाज इकट्ठा
करना सरकार की मजबूरी है। एमएसपी तब बंद होगी जब सरकार खाद्य निगम और वेयरहाउसों का
निजीकरण कर देगी या फिर उद्योगपति खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लेंगे।


 

इस काम में कम से कम तीन-चार
साल लगेंगे। तब तक सरकार की मजबूरी है कि गेहूं-धान समेत कुछ फसलों को एमएसपी पर खरीदे।
इसलिए सरकार बार-बार दावा कर रही है कि हम एमएसपी बंद नहीं कर रहे हैं। वैसे भी कड़वी
सच्चाई यही है कि आजकल किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकारी खरीद पर ही मिल रहा
है। खुले बाजार में किसान को फसल एमएसपी के कहीं कम कीमतों पर बेचनी पड़ती है। अब इन
तीनों कानूनो के लागू होने के बाद उद्योगपति खुला खेल खेलेंगे। कागजों में एमएसपी लागू
रहेगा। लेकिन वे उपज को मर्जी के भाव ही खरीदेंगे और उन्हें रोकने के लिए कोई कानून
नहीं होगा।


देश की 14-15 बड़ी कंपनियां
और उनकी फ्रेंचाइजी ही इस कालाबाजारी के खेल की बड़ी खिलाड़ी होंगी। ये जितना चाहे
खरीदारी कर भंडारण कर लेंगी। इसके बाद कालाबाजारी का असली खेल शुरू होगा। अकूत भंडारण
के जरिए मार्केट में उपरोक्त वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा कर दी जाएगी। उसके बाद खरीद
से कई गुना ज्यादा कीमत पर बाजार ये वस्तुएं बेची जाएंगी। वैसे भी प्राइवेट कंपनियों
को जनता के हित से कोई लेना-देना नहीं है। इनका एकमात्र मकसद मुनाफा कमाना होता है।
जब रोजाना इस्तेमाल में आने वाली खाद्य वस्तुओं का भाव दोगुना, तिगुना और चौगुना हो
जाएगा तो मध्यम वर्ग का बजट गड़बड़ा जाएगा। जबकि गरीब तो पूरी तरह से बर्बाद ही हो
जाएगा। उस वक्त की सरकार के पास मूकदर्शक बने रहकर देखने के सिवाय कुछ नहीं होगा।


कृषि उत्पादन व्यापार और
वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल 2020 में सरकार कह रही है कि हमने किसानों को कहीं
भी फसल बेचने की आजादी दे दी। अब यह समझिए कि ये आजादी कैसी होगी? जब फसल मंडी में
नहीं बिकेगी तो कहां बिकेगी? इसे समझने के लिए पहले की व्यवस्था को जानना होगा। पहले
मंडी में फसल खरीदने कौन आता था? एक खरीदार सरकार थी। ये एमएसपी पर खरीद करती थी। गेहूं
के लिए फ्लोर मिल के मालिक, चावल के लिए राइस मिल के मालिक, दाल के लिए बड़े व्यापारी
व दाल मिल के मालिक, सरसों के लिए तेल मिलों के मालिक, कपास के लिए रुई मिलों के मालिक
मंडियों में जाकर आढ़तियों के माध्यम से खरीद करते थे। खरीद के बाद आढ़ती मंडी में
ही किसानों को उनका भुगतान कर देते थे।


अब इस कानून के पास होने
के बाद सरकारी खरीद को छोड़कर शायद ही कोई मिल मालिक मंडियों की तरफ मुंह करें। ये
सरकार जिसे आजादी कह रही है, उस कथित आजादी का कथित आजाद किसान कहां अपनी फसल बेचेगा?
तो जवाब है कि वो अपनी फसल औने-पौने दाम पर घर पर ही किसी मिल या कंपनी के दलाल या
एजेंट को बेच दे।


दूसरी आजादी ये होगी कि ट्रैक्टर
ट्राली या बुग्गी को लेकर अपनी उपज लेकर मिलों के दरवाजे पहुंचे। जहां मिल मालिक मर्जी
के दाम पर उपज खरीदेगा। साथ ही चढ़ाई, तुलाई, भराई के भी पैसे काटेगा। मौजूदा अनुभव
यही बताते हैं कि पूरी आशंका होगी कि किसान को उनकी उपज का महीनों भुगतान ना करे। यही
हकीकत है। मिल मालिकों ने आढ़तियों के सैकड़ों करोड़ दबा रखे हैं। ऐसे में छोटे किसान
की क्या बिसात। थोड़े दिनों के बाद यह भी हो सकता है कि बड़ी कंपनियां जिला स्तर पर
वेयरहाउस बना लें तो किसानों को वहां जाकर उनकी शर्तों और कीमतों पर उपज बेचना पड़ेगा।
वहां भी गारंटी नहीं होगी कि फसल बिकते ही दाम मिल जाएंगे। हो सकता है छह महीने साल
भर बाद जब कंपनी मुनाफे के साथ किसानों की फसल बेच ले तो दाम कम मिले।


कानून बनने के बाद बदलाव
ये होगा कि फसल बेचने के बाद किसान घर के पास की मंडी में जाकर फसल बेचता था। सरकार
के दबाव की वजह से शाम तक पेमेंट लेकर घर आ जाता था। अब झमेले में फंसकर उपज औने-पौने
दामों में बेचनी पड़ेगी। अब पेमेंट भी जल्दी मिलने की कोई गारंटी नहीं होगी। ये तो
हुई किसानों को सीधे नुकसान की बात। इसके अलावा मंडी शुल्क के तौर पर सरकार को हजारों
करोड़ रुपए मिलता था। ये एक तरह से किसान फंड ही था। इससे सिर्फ किसानों के लिए ही
कई योजनाएं चलती थीं। यहां तक कि गांव की सड़कें और गलियां भी इस फंड से बनाई जाती
थी। अब जब मंडी शुल्क ही खत्म हो जाएंगा तो ये सारे विकास के काम भी बंद हो जाएंगे।


सरकार तर्क दे रही है इन
कानूनों से बाजार में प्रतियोगिता बढ़ेगी। प्रतियोगिता तो मंडियों में भी होती थी।
वहां व्यापारी व मिल मालिक किसान की उपज की बोली लगाते थे। इससे किसान को उसकी उपज
का वाजिब दाम मिलता था। लेकिन अब किसानों को जब व्यापारियों और मिल मालिकों के दरवाजे
जाना पड़ेगा तो वे अपनी मनमर्जी का ही दाम देंगे। अब इससे किसान को किस तरह मुनाफा
होगा?


तीसरा कानून कांट्रैक्ट फार्मिंग
का है। ये और कुछ नहीं बल्कि किसानों की मेड़ तोड़कर उद्योगपतियों को जमींदार बनाने
की साजिश है। किसान कंपनियों की खेती करेंगा तो वो मजदूर बनकर रह जाएगा। किसानों के
अधिकारों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उपज
खरीदने वाला है एक होगा और विक्रेता कई होंगे। इससे प्रतिस्पर्धा घटेगी। इसका नुकसान
किसान को उठाना पड़ेगा। कांट्रैक्ट फार्मिंग पहले भी देश में आंशिक रूप से होती रही
है। ये भी सरकार के कानून के तहत ही होती थी। लेकिन इसमें किसानों को भारी नुकसान उठाना
पड़ा। इसके कई उदाहरण हैं। कई कंपनियों ने किसानों से कांट्रेक्ट करके पापुलर व सफेदा
पैदा कराया। लेकिन बाद में खरीदने से मना कर दिया। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना
पड़ा।


उत्तर प्रदेश में गन्ना भी
एक प्रकार की कॉन्टैक्ट फॉर्मिंग हैं। जिसके नतीजे सबके सामने हैं। मिल में पहुंचने
के बाद भी 2 साल तक पेमेंट नहीं हो रही है। सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही है। यहां तक
कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि किसानों को 14 फीसदी ब्याज के साथ पेमेंट दी
जाए। लेकिन ब्याज तो दूर की बात है किसानों को मूल भी नहीं मिल पा रहा है।


कांट्रैक्ट फार्मिंग की सबसे
बड़ी दिक्कत यही है कि देश में किसान छोटे हैं। ज्यादातर किसान 2 या 3 एकड़ वाले हैं।
कंपनियां बहुत बड़ी-बड़ी हैं। वे अनुबंध बिल्कुल नहीं मानेगी। उनको मुनाफा होगा तो
फसल खरीद लेंगी। मुनाफा नहीं होगा तो कोई ना कोई कमी बताकर मना कर देगी। साल-दो साल
पेमेंट ही नहीं करेंगी। सरकार ने कानून भी ऐसा बनाया है कि किसान न्यायालय भी नहीं
जा सकता। उसके पास सिर्फ एसडीएम के पास जाने का रास्ता होगा औऱ डीएम के यहां अपील कर
सकता है। इस देश की सरकारी व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं है। अगर किसानों को विवाद
की हालत में एक दो बार एसडीएम के पास जाना पड़ा तो उसके पास जमीन बेचने के अलावा कोई
चारा नहीं होगा।


इस प्रकार के कानून हर तरह
से किसान विरोधी हैं। सरकार ने ये कानू बनाए तो उद्योगपतियों के फायदे के लिए हैं लेकिन
बेशर्मी देखिए कि इन्हें किसान हितैषी बता रही है। कानून बनाने के दौरान किसी किसान
संगठन से नहीं पूछा गया। संसदीय समिति की राय नहीं ली गई। संसद में जल्दबाजी में बहस
कराया और मतदान कराए बगैर जबरदस्ती बिल पास करा दिया। अब किसानों के पास सरकार के खिलाफ
आंदोलन के अलावा कोई चारा नहीं है। अब किसानों का सब कुछ बाजी पर लगाकर इस आंदोलन में
कूदना पड़ेगा।


(लेखक डॉ. संजय लाठर समाजवादी
पार्टी के विधायक हैं। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं। डॉ. लाठर  किसानों और नौजवानों के मुद्दे पर हमेशा अपनी राय
बेबाकी से रखने के लिए जाने जाते हैं।)

 
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